टिहरी के बारे मे आप तक कूछ जानकरी

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About Old Tehri

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टिहरी के बारे मे आप तक कूछ जानकरी

टिहरी सन् 1815 से पूर्व तक एक छोटी सी बस्ती थी।धुनारों की बस्ती, जिसमें रहते थे 8-10 परिवार। इनका व्यवसाय था तीर्थ यात्रियों व अन्य लोगों को नदी आर-पार कराना। धुनारों की यह बस्ती कब बसी। यह विस्तृत व स्पष्ट रूप सेज्ञात नहीं लेकिन 17वीं शताब्दी में पंवार वंशीयगढ़वाल राजा महीपत शाह के सेना नायक रिखोलालोदी के इस बस्ती में एक बार पहुंचने का इतिहास मेंउल्लेख आता है। इससे भी पूर्व इस स्थान का उल्लेख स्कन्दपुराण के केदार खण्ड में भी है जिसमें इसे गणेशप्रयाग वधनुषतीर्थ कहा गया है। सत्तेश्वर शिवलिंग सहित कुछ औरसिद्ध तीर्थों का भी केदार खण्ड में उल्लेख है। तीननदियों के संगम (भागीरथी, भिलंगना व घृत गंगा) यातीन छोर से नदी से घिरे होने के कारण इस जगह कोत्रिहरी व फिर टीरी व टिहरी नाम से पुकारा जानेलगा।पौराणिक स्थल व सिद्ध क्षेत्र होने के बावजूदटिहरीको तीर्थस्थल के रूप में ज्यादा मान्यता व प्रचार नहींमिल पाया।

ऐतिहासिक रूप से यह 1815 में ही चर्चा मेंआया जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सहायता से गढ़वालराजा सुदर्शन शाह गोरखों के हाथों 1803 में गंवा बैठेअपनी रियासत को वापस हासिल करने में तो सफल रहेलेकिन चालाक अंग्रेजों ने रियासत का विभाजन करउनके पूर्वजों की राजधानी श्रीनगर गढ़वाल वअलकनन्दा पार का समस्त क्षेत्र हर्जाने के रूप मे हड़पलिया। सन् 1803 में सुदर्शन शाह के पिता प्रद्युम्न शाहगोरखों के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। 12साल के निर्वासित जीवन के बाद सुदर्शन शाह शेष बचीअपनी रियासत के लिए राजधानी की तलाश में निकलेऔर टिहरी पहुंचे। किंवदंती के अनुसार टिहरी के कालभैरव ने उनकी शाही सवारी रोक दी और यहीं परराजधानी बनाने को कहा। 28 या 30 दिसम्बर 1815 कोसुदर्शन शाह ने यहां पर विधिवत गढ़वाल रियासतकीराजधानी स्थापित कर दी। तब यहां पर धुनारों के मात्र8-10 कच्चे मकान ही थे।राजकोष लगभग खाली था। एक ओर रियासत कोव्यवस्था पर लाना व दूसरी ओर राजधानी के विकासकी कठिन चुनौती। 700 रु. में राजा ने 30 छोटे-छोटे मकान बनवाये और यहीं से शुरू हुई टिहरी के एकनगर के रूप मेंआधुनिक विकास यात्रा। राजमहल का निर्माण भी शुरूकरवाया गया लेकिन धन की कमी के कारण इसे बनने मे लग गये पूरी 30 साल। इसी राजमहल को पुराना दरबार के नाम से जाना गया।टिहरी की स्थापना अत्यन्त कठिन समय व रियासती दरिद्रता के दौर में हुई। तब गोरखों द्वारा युद्ध के दौरान रौंदे गये गांव के गांव उजाड़ थे। फिर भी टैक्स लगाये जानेशुरू हुए। जैसे-जैसे राजकोष में धन आता गया टिहरी में नए मकान बनाए जाते रहे। शुरू के वर्षों में जब लोग किसीकाम से या बेगार ढ़ोने टिहरी आते तो तम्बुओं में रहते।

सन् 1858 में टिहरी में भागीरथी पर लकड़ी का पुलबनाया गया इससे आर-पास के गांवों से आना-जाना सुविधाजनक हो गया।1859 में अंग्रेज ठेकेदार विल्सन ने रियासत के जंगलों के कटान का ठेका जब 4000 रु. वार्षिक में लिया तो रियासत की आमदनी बढ़ गई। 1864 में यह ठेका ब्रिटिश सरकार ने 10 हजार रु. वार्षिक में ले लिया।अब रियासत के राजा अपनी शान-शौकत पर खुल कर खर्च करने की स्थिति में हो गये।1859 में सुदर्शन शाह की मृत्यु हो गयी और उनके पुत्रभवानी शाह टिहरी की राजगद्दी पर बैठे। राजगद्दी पर विवाद के कारण इस दरम्यान राज परिवार के ही कुछ सदस्यों ने राजकोष की जम कर लूट की और भवानी शाह के हाथ शुरू से तंग हो गये। उन्होंने मात्र 12 साल तक गद्दी सम्भाली। उनके शासन में टिहरी में हाथ से कागज बनानेका ऐसा कारोबार शुरू हुआ कि अंग्रेज सरकार केअधिकारी भी यहां से कागज खरीदने लगे।भवानी शाह के शासन के दौरान टिहरी में कुछ मंदिरोंका पुनर्निर्माण किया गया व कुछ बागीचे भी लगवायेगये।1871 में भवानी शाह के पुत्र प्रताप शाह टिहरी कीगद्दी पर बैठे। भिलंगना के बांये तट पर सेमल तप्पड़ में उनकाराज्याभिषेक हुआ। उनके शासन मे टिहरी में कई नयेनिर्माण हुए। पुराना दरवार राजमहल से रानी बाग तकसड़क बनी, कोर्ट भवन बना, खैराती सफाखान खुला वस्थापना हुई। रियासत के पहले विद्यालय प्रतापकालेजकी स्थापना जो पहले प्राइमरी व फिर जूनियर स्तर काउन्हीं के शासन में हो गया।राजकोष में वृद्धि हुई तो प्रतापशाह ने अपने नाम से 1877मंे टिहरी से करीब 15 किमी पैदल दूर उत्तर दिशा मेंऊंचाई वाली पहाड़ी पर प्रतापनगर बसाना शुरू किया।इससे टिहरी का विस्तार कुछ प्रभावित हुआ लेकिनटिहरी में प्रतापनगर आने-जाने हेतु भिलंगना नदी पर झूलापुल (कण्डल पुल) का निर्माण होने से एक बड़े क्षेत्र (रैका-धारमण्डल) की आबादी का टिहरी आना-जानाआसान हो गया। नदी पार के गांवों का टिहरी से जुड़तेजाना इसके विकास में सहायक हुआ। राजधानी तो यहथी ही व्यापार का केन्द्र भी बनने लगी।

टिहरी शहर और टिहरी की यादें

घण्टा घर – टिहरी शहर

1887 में प्रतापशाह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र कीर्तिशाह गद्दी पर बैठा। उन्होंने एक और राजमहलकौशल दरबार का निर्माण कराया। उन्होंने प्रताप कालेज को हाईस्कूल तक उच्चीकृत कर दिया। कैम्बल बोर्डिंग हाउस, एक संस्कृत विद्यालय व एक मदरसा भी टिहरी में खोला गया। कुछ सरकारी भवन बनाए गये,जिनमें चीफ कोर्ट भवन भी शामिल था। इसी चीफकोर्ट भवन मे 1892 से पूर्व तक जिला सत्र न्यायालय चलता रहा। 1897 में यहां घण्टा घर बनाया गया जो तत्कालीन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया की हीरकजयंती की स्मृति में बनाया गया था। इसी दौरान शहर को नगर पालिका का दर्जा भी दे दिया गया।सार्वजनिक स्थानों तक बिजली पहुंचाई गई। इससे पूर्व राजमहल में ही बिजली का प्रकाश होता था। कीर्तिशाह ने अपने नाम से श्रीनगर गढ़वाल के पास अलकनन्दा के इस ओर कीर्तिनगर भी बसाया लेकिन तब भी टिहरी की ओर उनका ध्यान रहा। कीर्तिनगर से उनके पूर्वजों की राजधानी श्रीनगर चार किमी दूर ठीक सामने दिखाई दे जाती है। कीर्तिशाह के शासन के दौरान ही टिहरी में सरकारी प्रेस स्थापित हुई जिसमें रियासत का राजपत्र व अन्य सरकारी कागजात छपते थे। स्वामी रामतीर्थ जब (1902में) टिहरी आये तो राजा ने उनके लिए सिमलासू में गोल कोठी बनाई यह कोठी शिल्पकला का एक उदाहरण मानी जाती थी। सन् 1913 में कीर्तिशाह की मृत्यु के बादउनका पुत्रनरेन्द्रशाह टिहरी की गद्दी पर बैठा। 1920 में टिहरी मेंप्रथम बैंक (कृषि बैंक) की स्थापना हुई और 1923 मेंपब्लिक ‘लाइब्रेरी’ की। यह लाइब्रेरी बाद में सुमनलाइब्रेरी कें नाम से जानी गई जो अब नई टिहरीमें है।1938 में काष्ट कला विद्यालय खोला गया और1940 मेंप्रताप हाईस्कूल इन्टर कालेज में उच्चीकृत कर दिया गया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतभर में मोटरगाडि़यां खूब दौड़ने लगी थी। टिहरी में भी राजा कीमोटर गाड़़ी थी जो राजमहल से मोतीबाग व बाजारमेंही चलती थी। तब तक ऋषिकेश-टिहरी मोटर मार्ग नहींबना था इसलिए मोटर गाड़ी के कलपुर्जे अलग-अलगलाकर टिहरी में ही जोड़े गये थे।नरेन्द्रशाह ने मोटर मार्ग की सुविधा देखते हुए 1920 मेंअपने नाम से ऋषिकेश से 16 किमी दूर नरेन्द्रनगर बसानाशुरू किया। 10 साल में 30 लाख रु. खर्च कर नरेन्द्रनगरबसाया गया। इससे टिहरी के विकास मे कुछ गतिरोध आगया। 1926 में नरेन्द्रनगर व 1940 में टिहरी तक सड़क बन गईऔर गाडि़यां चलने लगी। पांच साल तक गाडि़यांभागीरथी पार पुराना बस अड्डा तक ही आती थी।टिहरी का पुराना पुल 1924 की बाढ़ में बहगया था।लगभग उसी स्थान पर लकड़ी का नया पुल बनाया गया।इसी पुल से पहली बार 1945 में राजकुमार बालेन्दुशाह नेस्वयं गाड़ी चलाकर टिहरी बाजार व राजमहल तकपहुंचाई। 1942 में टिहरी में एक कन्या पाठशाला भी शुरूकी गई।1946 को टिहरी में ही नरेन्द्रशाह ने राजगद्दी स्वेच्छा सेअपने पुत्र मानवेन्द्र शाह को सौंप दी जिन्होंने मात्र दोवर्ष ही शासन किया। 1948 में जनक्रांति द्वाराराजशाही का तख्ता पलट गया। सुदर्शन शाह से लेकरमानवेन्द्र शाह तक सभी छः राजाओं का राज तिलकटिहरी में ही हुआ।टिहरी के विकास का एक चरण 1948 में पूरा हो जाता हैजो राजा की छत्र-छाया में चला। इस दौरान राजाओंद्वारा अलग-अलग नगर बसाने से टिहरी की विकासयात्रा पर प्रभाव पड़ा लेकिन तब भी इसका महत्व बढ़ताही रहा। राजमाता (प्रतापशाह की पत्नी) गुलेरिया नेअपने निजी कोष से बदरीनाथ मंदिर व धर्मशाला बनवाईथी। विभिन्न राजाओं के शासन के दौरान- मोती बाग,रानी बाग, सिमलासू व दयारा में बागीचेलगाये गये। शीशमहल, लाट कोठी जैसे दर्शनीय भवनबने वकई मंदिरों का भी पुनर्निर्माण कराया गया।1948 में अन्तरिम राज्य सरकार ने टिहरी-धरासू मोटरमार्ग पर काम शुरू करवाया।

1949 में संयुक्त प्रांत मेंरियासत के विलीनीकरण के बाद टिहरी के विकास केनये रास्ते खुले ही थे कि शीघ्र ही साठ के दशक में बांधकी चर्चायें शुरू हो गई। लेकिन तब भी इसकी विकासयात्रा रुकी नहीं। भारत विभाजन के समय सीमांतक्षेत्रसे आये पंजाबी समुदाय के कई परिवार टिहरी मेंआकरबसे। मुस्लिम आबादी तो यहां पहले से थी ही।जिला मुख्यालय नरेन्द्रनगर में रहा लेकिन तब भी कईजिला स्तरीय कार्यालय टिहरी में ही बने रहे। जिलान्यायालय, जिला परिषद, ट्रेजरी सहित दो दर्जन जिलास्तरीय कार्यालय कुछ वर्ष पूर्व तक टिहरी मेंही रहे जोबाद में नई टिहरी में लाये गये।सत्तर के दशक तक यहां नये निर्माण भी होते रहे व नईसंस्थाएं भी स्थापित होती रही। पहले डिग्री कालेज वफिर विश्व विद्यालय परिसर, माॅडल स्कूल, बीटीसीस्कूल, राजमाता कालेज, नेपालिया इन्टर कालेज, संस्कृतमहाविद्यालय सहित अनेक सरकारी व गैर सरकारीविद्यालय खुलने से यह शिक्षा का केन्द्र बन गया। यद्यपिसाथ-साथ बांध की छाया भी इस पर पड़ती रही। सुमनपुस्तकालय इस शहर की बड़ी विरासत रही है जिसमेंकरीब 30 हजार पुस्तके हैं।राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक ढ़ांचे के अनुरूप बसतेगये टिहरी शहर के मोहल्ले मुख्य बाजार के चारों ओरइसकी पहचान को नये अर्थ भी देते गये। पुराना दरवार तोथा ही, सुमन चैक, सत्तेश्वर मोहल्ला, मुस्लिम मोहल्ला,रघुनाथ मोहल्ला, अहलकारी मोहल्ला, पश्चिमियानामोहल्ला, पूर्वियाना मोहल्ला, हाथी थान मोहल्ला,सेमल तप्पड़, चनाखेत, मोती बाग, रानी बाग, भादू कीमगरी, सिमलासू, भगवत पुर, दोबाटा, सोना देवी सभीमोहल्लों के नाम सार्थक थे और इन सबके बसते जाने सेबनी थी टिहरी।मूल वासिंदे धुनारों की इस बस्ती में शुरू में वे लोग बसे जोसुदर्शन शाह के साथ आये थे। इनमें राजपरिवार के सदस्योंके साथ ही इनके राज-काज के सहयोगी व कर्मचारीथे।राजगुरू, राज पुरोहित, दीवान, फौजदार, जागीरदार,माफीदार, व दास-दासी आदि। बाद में जब राजारियासत के किन्हीं लोगों से खुश होते या प्रभावितहोते तो उन्हें जमीन दान करते। धर्मार्थ संस्थाओं को भीजमीन दी जाती रही।बाद में आस-पास के गांवों के वे लोग जो सक्षमथे टिहरीमें बसते चले गये। आजादी के बाद टिहरी सबके लिये अपनीहो गई। व्यापार करने के लिये भी काफी लोग यहां पहुंचेव स्थाई रूप से रहने लगे। बांध के कारण पुनर्वास हेतु जबपात्रता बनी तो टिहरी के भूस्वामी परिवारों कीसंख्या 1668 पाई गई। अन्य किरायेदार, बेनाप वकर्मचारी परिवारों की संख्या करीब साढ़े तीन हजारथी।बिषेश टिहरी – इतिहास की झलकपौराणिक काल – टिहरी स्थित भागीरथी, भिलंगना वघृत गंगा के संगम का गणेश प्रयाग नाम से स्कन्ध पुराण केकेदारखण्ड में उल्लेख। सत्येश्वर महादेव (शिवलिंग) वलक्षमणकुण्ड (संगम का स्नान स्थल) शेष तीर्थ व धनुषतीर्थ आदि स्थानों का भी केदारखण्ड में उल्लेख।17वीं सताब्दी- (1629-1646 के मध्य) पंवार बंशीयराजा महीपत शाह के सेनापति रिखोला लोदी काधुनारों के गांव टिहरी में आगमन और धुनारों को खेती केलिए कुछ जमीन देना।सन् 1803- नेपाल की गोरखा सेना का गढ़वाल परआक्रमण। श्रीनगर गढ़वाल राजधानी पंवार वंश सेगोरखोंने हथिया ली व खुड़बूड़ (देहरादून) के युद्ध में राजा प्रद्युम्नशाह को वीरगति। प्रद्युम्न शाह के नाबालिग पुत्रसुदर्शन शाह ने रियासत से पलायन कर दिया।जून, 1815- ईस्ट इण्डिया कम्पनी से युद्धमें गोरखा सेनाकी निर्णायक पराजय, सुदर्शन शाह ने ईस्ट इण्डियाकम्पनी से सहायता मांगी थी।जुलाई, 1815- सुदर्शन शाह अपनी पूर्वजों की राजधनीश्रीनगर गढ़वाल पहुंचा और पुनः वहां से रियासत संचालनकी इच्छा प्रकट की।नवम्बर, 1815- ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने दून क्षेत्र वश्रीनगर गढ़वाल सहित अलकनन्दा के पूरब वाला क्षेत्रअपने शासन में मिला दिया और पश्चिम वाला क्षेत्रसुदर्शन शाह को शासन करने हेतु वापस सौंप दिया।

29 दिसम्बर, 1815- नई राजधनी की तलाश में सुदर्शनशाह टिहरी पहुंचे, रात्रि विश्राम किया। किंबदंती केअनुसार काल भैरव ने उनका घोड़ा रोक दिया था। यहभी किंबदंती है कि उनकी कुलदेवी राजराजेश्वरीने सपनेमें आकर सुदर्शन शाह को इसी स्थान पर राजधानीबसानेको कहा था।30 दिसम्बर, 1815- टिहरी में गढ़वाल रियासत कीराजधनी स्थापित। इस तरह पंवार वंशीय शासकों कीराजधनी का सफर 9वीं शताब्दी में चांदपुर गढ़से प्रारम्भहोकर देवल गढ़ व श्रीनगर गढ़वाल होते हुए टिहरी तकपहुंचा।जनवरी, 1816- टिहरी में राजकोष से 700 रुपये खर्च करएक साथ 30 मकानों का निर्माण शुरू किया गया। कुछतम्बू भी लगाये गये।6 फरवरी, 1820- प्रसिद्ध ब्रिटिश पर्यटक मूर क्राफ्रटअपने दल के साथ टिहरी पहुंचा।4 मार्च, 1820- सुदर्शन शाह को ईस्ट इण्डिया कम्पनी केगर्वनर जनरल ने गढ़वाल रियासर के राजा के रूपमेंमान्यता (स्थाई सनद) दी।1828- सुदर्शन शाह द्वारा सभासार ग्रंथ की रचना कीगयी।1858- भागीरथी नदी पर पहली बार लकड़ी कापुलबनाया गया।1859- अग्रेज ठेकेदार विल्सन ने चार हजार रुपये वार्षिकपर रियासत में जंगल कटान का ठेका लिया।तिथि ज्ञात नहीं- सुदर्शन शाह ने टिहरी मेंलक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण करवाया।4 मई, 1859- सुदर्शन शाह की मृत्यु। भवानी शाह गद्दीपर बैठे।तिथि ज्ञात नहीं (1846 से पहले)- प्रसिद्ध कुमाऊंनीकवि गुमानी पंत टिहरी पहुंचे और उन्होंने टिहरी परउपलब्ध पहली कविता- ‘सुरगंग तटी…….’ की रचना की।1859 (सुदर्शन शाह की मृत्यु के बाद)- राजकोष की लूट।कुछ राज कर्मचारी व खवास (उपपत्नी) लूट में शामिल।1861- टिहरी से लगी पट्टी अठूर में नई भू-व्यवस्था लागूकी गयी।1864- भागीरथी घाटी के जंगलों का बड़े पैमाने परकटान शुरू। विल्सन को दस हजार रुपये वार्षिक पर जंगलकटान का ठेका दिया गया।1867- अठूर के किसान नेता बदरी सिंह असवाल कोटिहरी में कैद किया गया।सितम्बर, 1868- टिहरी जेल में बदरी सिंह असवाल कीमौत। टिहरी व अठूर पट्टी में हलचल मची।

1871- भवानी शाह की मृत्यु। राजकोष की फिर लूट हुई।प्रताप शाह गद्दी पर बैठे।1876- टिहरी में पहला खैराती दवा खाना खुला।1877- भिलंगना नदी पर कण्डल झूला पुल कानिर्माण।टिहरी से प्रतापनगर पैदल मार्ग का निर्माण ।1881- रानीबाग में पुराना निरीक्षण भवन कानिर्माण।फरवरी 1887- प्रताप की मृत्यु। कीर्तिनगर शाह के वयस्कहोने तक राजामाता गुलेरिया ने शासन सम्भाला।1892- टिहरी में बद्रीनाथ, केदारनाथ मन्दिरों कानिर्माण राजमाता गुलेरिया ने करवाया।17 मार्च 1892- कीर्ति शाह ने शासन सम्भाला।20 जून 1897- टिहरी में ब्रिटेन की महारानीविक्टोरिया की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में घण्टाघरका निर्माण शुरू।1902- स्वामी रामतीर्थ का टिहरी आगमन।1906- स्वामी रामतीर्थ टिहरी में भिलंगना नदी में जलसमाधि।25 अप्रैल 1913- कीर्ति शाह की मृत्यु। नरेन्द्र शाह गद्दीपर बैठे।1917- रियासत के बजीर पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी ने नरेन्द्रहिन्दू लाॅ ग्रंथ की रचना की।1920- टिहरी में कृषि बैंक की स्थापना। पंडित हरिकृष्णरतूड़ी ने गढ़वाल का इतिहास ग्रंथ लिखा।1923- रियासत की प्रथम पब्लिक लाइब्रेरीकीस्थापना।1924- बाढ़ से भागीरथी पर बना लकड़ी का पुल बहा।1938- टिहरी में रियासत का हाईकोर्ट बना। गंगाप्रसाद प्रथम जीफ जज नियुक्त किये गये।1940- प्रताप कालेज इण्टरमीडिएट तक उच्चीकृत।1940- ऋषिकेश-टिहरी सड़क निर्माण का कार्य पूरा।टिहरी तक गडि़यां चलनी शुरू।1942- टिहरी में प्रथम कन्या पाठशाला कीस्थापना।1944- टिहरी जेल में श्रीदेव सुमन का बलिदान।5 अक्टूबर 1946- मानवेन्द्र शाह कर राजतिलक।1945-48- प्रजा मंडल के नेतृत्व में टिहरी जनक्रांति काकेन्द्र बना।14 जनवरी 1948- राजतंत्र का तख्ता पलट। नरेन्द्र शाहको भागीरथी पुल पर रोक कर वापस नरेन्द्र भेजागया।जनता द्वारा चुनी गई सरकार का गठन।अगस्त 1949- टिहरी रियासत का संयुक्त प्रांत में विलय।

1953- टिहरी नगरपालिका के प्रथम चुनाव। डाॅ.महावीर प्रसाद गैरोला अध्यक्ष चुने गये।1955- आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वतीका टिहरी आगमन।20 मार्च 1963- राजमाता कालेज की स्थापना।तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ0 राधाकृष्णन टिहरी पहंुचे।1963- टिहरी में बांध निर्माण की घोषणा।अक्टूबर 1968- स्वामी रामतीर्थ स्मारक का निर्माण।उद्घाटन तत्कालीन राज्यपाल डाॅ0 वी0गोपालारेड्डी द्वारा किया गया।1969- टिहरी में प्रथम डिग्री काॅलेज खुला।1978- टिहरी बांध विरोधी संघर्ष समिति का गठन।वीरेन्द्र दत्त सकलानी अध्यक्ष बने।29 जुलाई, 2005- टिहरी शहर में पानी घुसा, करीब सौपरिवारों को अंतिम रूप से शहर छोड़ना पड़ा।

29 अक्टूबर, 2005- बांध की टनल-2 बन्द, टिहरी में जलभराव शुरू।

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